वो अपना चौकीदार … !!
आज फिर उस डंडे की आवाज़ से राखी की नींद खुल गयी, और उसे अपने गाँव का वो चौकीदार याद आ गया और वो दिन जब उसे चौकीदार का मतलब समझ आया था !
उस दिन भी उसके डंडे कि आवाज़ से राखी कि नींद खुल गयी थी और थोड़ी देर बाद फिर वही डरावनी सीटी की आवाज़ आने लगी ! उसने सोचा की आज चाहे कुछ भी हो जाये हिम्मत करके एक बार बाहर झाँकेगी ज़रूर की आखिर कौन हर रोज़ आकर डराने की कोशिश करता है और सुबह जब उठती है तो गांव में किसी को कोई हानी नहीं हुई होती, सभी सुरक्षित होते हैं ! उससे रहा नहीं जा रहा था जाने बिना की आखिर कौन है जो हर ओज रात के तीसरे पहर में आकर उसे डराता है ! सोचा आज विद्यालय में अपनी दीदी से ही पूछ लेगी ! तैयार होकर विद्यालय पहुंची और जैसे ही दीदी कक्षा में आई राखी खड़ी हो गयी और बोली “दीदी मुझे आपसे एक बहुत ज़रूरी सवाल पूछना है !”
“हाँ राखी पूछो ना??”
“दीदी क्या आपको भी रात में किसी के डंडे और फिर सीटी की आवाज़ सुनाई देती है??”
दीदी समझ तो गयी की राखी गाँव के चौकीदार के बारे में बात कर रही है, और ५ साल की राखी के मुंह से ये सवाल सुनकर उन्हें हंसी भी आई मगर वो चाहती थी की राखी अपनी बात पूरी कहे इसलिए उन्होंने अपने मन की बात को मन में रखते हुए उससे पूछा कि- “हाँ राखी मैंने आवाज़ सुनी तो है मगर तुम इतना परेशान होकर क्यूँ पूछ रही हो??”
राखी ने सहमते हुए जबाव दिया ” दीदी मुझे लगता है कि हमारे गाँव में रोज़ रात कोई भूत आता है जो अजीब डरावनी सीटी बजाता है और सबको डराता है मगर मुझे ये समझ नहीं आता कि वो किसी को हानि क्यूँ नहीं पहुंचता ? जब मैं सुबह सोकर उठती हूँ तो मुझे गाँव में सभी सकुशल मिलते हैं ??”
राखी कि मासूमियत भरी वो बात सुनकर पहले तो दीदी को बहुत हसीं आई फिर उन्होंने उसे समझाते हुए कहा कि “वो किसी को हानि इसलिए नहीं पहुंचता क्यूँ कि वो हमारे गाँव का रखवाला है ! हमारा चौकीदार, जिसे गाँव कि रखवाली करने के लिए पैसा मिलता है इसलिए वो रात भर जागता है और गाँव में फेरी लगता है ताकि कोई चोर या डाकू हमारे गाँव में ना आ सके !!”
उस समय गाँव में पुलिश थाना नहीं हुआ करता था, गाँव इतना छोटा था इसलिए ४ गाँव मिलकर एक थाना होता था, इसलिए हर गाँव में एक चौकीदार होता था जो गाँव कि रखवाली करता था !
उस दिन राखी को चौकीदार का मतलब भी समझ आ गया और उसने अगली रात चौकीदार से मिलकर अपने मन कि तसल्ली भी कर ली कि वो कोई भूत नहीं बल्कि एक इंसान ही है ! मगर एक सवाल उसके मन में रह गया कि एक अकेला इंसान जिसके पास सिर्फ एक डंडा है गाँव कि रखवाली कैसे कर सकता है?? उस समय तो बाल मन ने उस सवाल पर कोई जोर नहीं दिया मगर वो सवाल भूला भी नहीं ! धीरे धीरे गाँव ने तरक्की की और पुलिश थाना भी आ गया, मगर जबसे गाँव में पुलिश थाना आया था गाँव में वारदातें बढ़ने लगी थी ! आये दिन चोरी और लूटपाट कि खबरे सुनने में आने लगी ! चौकीदार तो अब भी था मगर अब गाँव वाले उससे जादा भरोसा पुलिश वालों पर करने लगे थे इसलिए उन्होंने चौकीदार को पैसे देना बंद कर दिया ! मगर फिर भी क्यूंकि उसे अपने गाँव के लोगों से लगाव था तो वो एक फेरी दे आता था ताकि अगर उस फेरी में कोई वारदात रोक पाए ! अब वो बिचारा भी क्या करता रोज़ी रोटी के लिए कुछ तो करता इसलिए उसने दिन में खेत पर काम करना शुरू कर दिया जिसकी वजह से रात में थक जाने के कारण वो एक फेरी भी नहीं दे पता था ! चौकीदारी बंद होते ही बाहर से आई पुलिश को पूरा मोका मिल गया अपनी हुकूमत ज़माने का और उन्होंने गाँव वालो को पूरी तरह अपने कब्जे में कर लिया! अब उन्हें चाहे अनचाहे पुलिश वालों कि बेमांगी मांगे पूरी करनी पड़ती थी ! गाँव तरक्की तो कर रहा था मगर साथ साथ लुट भी रहा था जिसे तरक्की कि चाह में अंधे बने गाँव के कुछ लोगों ने अनदेखा कर दिया ! मगर उन कुछ गिने चुने लोगों के अलावा बाकि के गाँव वालों को अहसास हो गया कि उन्होंने अपने ही गाँव के ईमानदार चौकीदार पर भरोसा ना करके गलत किया ! गाँव तरक्की तो तब भी करता मगर तब बर्बादी कम और आबादी ज्यादा होती ! हो सकता है थोडा धीरे होती मगर किसी का घर लूटे बिना होती, किसी के घर में मातम मचाये बिना होती !!
“वैसे बिगाड़ा तो अब भी कुछ नहीं है, फिर से अपने गाँव के चौकीदार (अपनी सच्ची और ईमानदार सरकार ) को अपने रखवाले कि तौर पर चुन लो, हो सकता है कि अब ज्यादा रखवाली करनी पड़े इसलिए एक के बदले दौ चौकीदार रखने पड़े मगर दोनो ही अपने गाँव के होंगे तो ईमानदारी कि संभावनाएं ज्यादा होंगी! और फिर अपने गाँव (भारत) को बाहर के गाँव कि पुलिश (भ्रष्ट नेता ) से बचाया जा सकता है ! फिर से अपना गाँव सुरक्षित हो सकता है ! फिर से अपना गाँव आबाद हो सकता है !! बस अपने गाँव में अपने ईमानदार चौकीदार को वापस लाना है !!”
लेखक : अंकिता जैन

अंकिता जैन
अंकिता जैन
शिक्षा : एम्- टेक (कम्प्यूटर साइंस इंजीनियरिंग)
कार्यक्षेत्र : असिस्टेंट प्रोफेसर, बंसल इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंजीनियरिंग, भोपाल (जुलाई११- जनवरी१२)
रिसर्च असोसिएट, सी-डेक, पुणे (जुलाई १० – मई ११)
एप्लीकेशन डेवलपर इन्टर्न, विप्रो, गुडगाँव (जनवरी०९ – जून०९)
Email : ankitajn@yahoo.in
Facebook : https://www.facebook.com/BatenKalamSe
अंकिता जैन, एक लेखिका भी है, जो अपने दिनचर्या में से समय निकाल कर अपने विचारो को कागज़ पर उतरना नहीं भूलती है. लिखने के अलावा अंकिता संगीत, पेंसिल स्केचिंग और फोटोग्राफी में भी रूचि रखती है !!









Nice Article ..
Thank you Ali
really impressive!!!
अतीव सुंदर व्यंग्यरूपक अंिकता जी !आपकी अप्रतिम प्रतिभा आपके लेखन की ऊँचाई को प्रतिभासित करती है !
वक्त जनता को न खोना चाहिए,
बेच कर घोड़े न सोना चाहिए ।
आपसी दंगे सरासर हैं गलत
नीच नेताओं को धोना चाहिए॥
मुल्क के गद्दार हैं ये सोच लो
नकली चेहरों से मुखौटे नोंच लो।
पाक दामन चाहिए हर रहनुमा
दीखना ना मुँह घिनौना चाहिए॥
हो चुकी हद पार हेराफेरियों की
साफ है नीयत नहीं इन भेड़ियों की।
कर तहलकों पर तहलकों की पहल
सोचते हैं धन संजोना चाहिए॥
shukriya sundeep ji.:)
Nice………
really impressive!!
Ankita really very nice article dear
[...] नोट : मेरी ये कहानी देखो भोपाल ६ फरवरी में प्रकाशित हो चुकी है. आप यहाँ पढ़ सकते हैं ! [...]